माथे का टीका मिटा हुआ

Maathe Kaa Tika Mita Hua

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एक बिन्दु से लेकर बृह्रमांड के वृहत्ताकार में एक विरोधाभास है बिन्दु को देखो तो व्यक्ति एकाग्रता को प्राप्त करने लगता है। और एकाग्रता मानसिक चेतनता को जन्म देती है। दूसरी और ब्रम्हाण्ड को समेटने की चेष्टा में मन विभ्रम हो एकाग्रता खो बैठता है। अचेतनता हावी होने लगती है। व्यक्ति को लौट कर बिन्दु पर नजर टिकानी पड़ती है अपनी खोई हुई एकाग्रता पाने के लिए।हां तो मेरे कवि ह्रदय ने उकसाया चलो बृह्रमांड की सैर कर आये और मैं सपनों में, भ्रमों में, अवचेतनता में छूने लगा उन पहलुओं को जो शायद चेतन मन छूने नहीं देता। लेकिन भला बृह्रामंड का सत्य हाथ आया है किसी के सिवाय एक आसान से निष्कर्ष के – कि जब तक सष्ष्टिक्रम चलते रहेगा,जब तक ब्रंद्याण्ड में तारे नक्षत्र ग्रह बनते, बिगडते रहेंगें, जब तक जीव सृजन होता रहेगा तब तक उत्थापन,विघटन,प्रलय व संहार व तन ह्रास होता रहेगा, ये एक क्रम है होता रहेगा, चलते रहेगा, तो फिर जितना बड़ा सच सृजन है, उतना बड़ा सच विघटन भी। इस आसान से निष्कर्ष ,के विघटन पहलू ने मेरे कवि- ह्रदय को अंदोर दिया क्योंकि सृजन रातों रात नहीं होता युग आये चले गये  सृजन एक आकार लेता रहा पर- विघटन जब हुआ यूं हुआ मानों आभास ही ना हुआ, हां संहार, अवसाद से लेकर उच्छेद और उत्पाटन तक सब कुछ कितना शीघ्र हो गया। सोचने का, लिखने का, वक्त कहां मिला।

लघु शब्दों में और छोटे माप दण्ड में कहूं : एक पूरा मौसम और माहौल आया, मिलन और विदाई की खुशियाँ  और कसक लाया, किसी ने पुलकित कुमकुम का थाल सजाया – आरती उतारी और माथे पर रोली का टीका लगाया। मगर क्या हुआ अनायास ये तो अहसास करने का वक्त भी न मिला : एक पल आया और माथे की रोली वह गयी और मेरा कवि ह्रदय देखता रह गया दर्पण में: 

माथे का टीका मिटा हुआ

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